पुस्तक समीक्षा

E : Etcetera हिंदी

जब अली बना बजरंगबली

जब अली बना बजरंगबली बच्चों को पर्यावरण से जोड़ने की यह शानदार कोशिश है
और ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों के हाथ में ये किताब होनी चाहिए।

रजनी सेन
 
किताब: जब अली बना बजरंगबली
कथा और अनुवाद: देवाशीष मखीजा
चित्रांकन: प्रिया कुरियन
पन्ने: ३२
प्रकाशक: तुलिका बुक्स
पाठक आयु वर्ग: 6+ वर्ष
 
यह सुन्दर किताब बच्चों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की अनोखी पहल है। हम सभी जानते हैं कि पेड़ काटने से न केवल इंसान बल्कि जानवर भी खतरे में हैं।विकास के नाम पर जीव जंतुओं और पक्षियों से उनके आवास स्थल छीने जा रहे हैं।
इस कहानी  में एक बंदर अली और उसके साथियों के रहने की जगह, बरगद का एक विशाल पेड़ इंसानों के निशाने पर है। अली और उसके साथी इंसानों की संवेदनहीनता से डरे हुए हैं।बरगद के पेड़ पर रहने वाले उल्लू, गिलहरी, तोता, कौआ आदि जीव और पक्षी परेशान हैं क्यूंकि एक बड़ी मूंछ वाला आदमी उनकी शरणस्थली को गिरा देना चाहता है। एक विशालकाय मशीन के जरिए वह बरगद का पेड़ गिर देना चाहता है। बंदर अली को एक शानदार तरकीब सूझती है।अली बजरंग बली यानी हनुमान जी का रूप धारण कर मूंछ वाले इंसान को सबक सिखाता है और वो इंसान  पेड़ काटने का आदेश रद्द कर देता है।इस कहानी के जरिए कथाकार ने बेहद खूबसूरती से बच्चों को पर्यावरण बचाने का संदेश दिया है। साथ ही यह भी बताया कि ईश्वर और धर्म से जुड़कर भी पर्यावरण और पेड़ों को बचाया जा सकता है।इस किताब में कहानी कहने की भाषा अत्यंत रोचक और बच्चों को लुभाने वाली हैl चित्र भी बच्चों का ध्यान आकर्षित करने में कामयाब होते हैं।
कुल मिलाकर बच्चों को पर्यावरण से जोड़ने की यह शानदार कोशिश है और ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों के हाथ में ये किताब होनी चाहिए।वैसे तो ये किताब छ: साल से बड़े बच्चों के लिए है, पर वयस्कों के लिए भी ये कहानी उतनी ही उपयोगी है जितनी बच्चों के लिए और बड़ों को भी इस किताब को पढ़ना चाहिए। कथाकार को इस सुंदर रचना के लिए बधाई।
ये किताब हिंदी और अंग्रेजी के अलावा तमिल, मलयालम, तेलुगु, मराठी, गुजराती, कन्नड़ और बंगला में भी उपलब्ध है ।
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