#Letstalktourboys | Keep it simple and short

हिंदी

बच्चे सहज होते हैं, हम खुद उन्हें असहजता सिखाते हैं

दिनेश श्रीनेत

मैंने अपने निजी अनुभव से यह महूसस किया है कि लैंगिक भेदभाव की बुनियाद बचपन और किशोरावस्था के दिनों से ही डाली जाती है। सबसे पहले लड़को को स्त्री के शरीर के प्रति असहज होना सिखाया जाता है। जिस बच्चे ने तीन या पांच साल की उम्र तक अपनी मां के स्तनों से खुद को पोषित किया हो, जो करीब 10-12 साल तक अपनी मां के बेहद करीब रहा हो, यदि उचित परवरिश हो तो वह कभी भी स्त्री के शरीर के प्रति असहज नहीं हो सकता। जब तक कि उसे जानबूझकर असहज न बनाया जाए।

इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण है महिलाओं के अंडरगार्मेंट्स को टैबू में तब्दील करना। ज्यादातर घरों में लड़कों से उन्हें छिपाया जाने लगता है। जबकि इस बात का बीजारोपण करने से पहले तक लड़कों के लिए यह वैसा ही एक वस्त्र होता है जैसे कि कोई अन्य वस्त्र। यह वस्त्र शर्म का कारण हो सकता है, यह मुझे तब महसूस हुआ जब मैंने अपने परिवार की कुछ सदस्यों जैसे- भाभियों को इन वस्त्रों को छुपाते या संकोच करते देखा। यह पहला चरण होता है जब आप स्त्री को अन्य समझने लगते हैं और उसके प्रति गैरजरूरी उत्सुकता का जन्म होने लगता है।

इसी तरह से पीरियड्स भी हैं। मैंने महसूस किया है कि यदि बच्चे पीरियड्स के बारे में जान भी जाएं तो उनकी दिलचस्पी उससे ज्यादा नहीं होती है। शरीर की दूसरी अन्य प्रक्रियाओं के बारे में हम परिवार काफी खुलकर चर्चा कर लेते हैं। यदि आप सहजता से पीरियड के बारे में उन्हें बता दें तो 80 प्रतिशत बच्चों के लिए यह काफी है। यदि वे ज्यादा उत्सुकता दिखाते हैं तो भी हम उन्हें इतनी जानकारी जो उनकी उम्र के लिहाज से जरूरी है बता सकते हैं। जब बच्चा साइंस या स्पेस से जुड़ा कोई प्रश्न पूछता है तो भी तो हम उसकी उम्र के मुताबिक ही जवाब देते हैं। हम उसे न्यूटन या आइंस्टीन की प्रकाश संबंधी थ्योरी नहीं पढ़ाने लगते। यही शारीरिक प्रक्रियाओं के बारे में भी है। इसमें हमने एक प्रयोग किया कि घर में सैनिटरी पैड छिपाना बंद कर दिया। बच्चे जब उसके बारे में पूछते थे तो यह बता दिया जाता था कि महिलाओं को इसकी महीने में कुछ दिन जरूरत होती है। इसके बाद कोई सवाल उनकी तरफ से नहीं आया।

यदि हम गौर करें तो करीब 10-11 साल की उम्र तक बच्चा अपने आसपास की हर चीज में दिलचस्पी लेता है। इसके बाद उसकी दिलचस्पी का दायरा कम होता है और उसका मन सामाजिकता में ज्यादा रमता है। खास तौर पर अपने दोस्तों के बीच। करीब 6 से 12 साल तक के लड़के और लड़कियां अपने अलग-अलग ग्रुप में खेलते हैं। इसकी एक वजह उनकी भिन्न-भिन्न रुचियां भी होती हैं। 14-15 साल की उम्र में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण बढ़ता है। यही वह समय है जब वे शारीरिक रूप से बदल रहे होते हैं।

मेरा यह मानना है कि किशोरवय के बच्चों को शारीरिक बदलावों के बारे में तो बताया ही जाना चाहिए, इस दौर में वे काफी इमोशनल उतार-चढ़ाव से गुजरते हैं। इसका खास ख्याल रखा जाना चाहिए। इसका सबसे बेहतर तरीका होता है कि बच्चों के साथ बातचीत करना। यह भी एक घिसी-पिटी मान्यता है कि बेटी मां के साथ और बेटा पिता के साथ ज्यादा सहज होता है। दोनों को बात करनी चाहिए। बच्चों को दोनों की जरूरत होती है। एक पिता अगर अपनी बेटी की भावनात्मक दिक्कतों या शारीरिक बदलावों पर बाद कर सके तो वह खुद में ज्यादा आत्मविश्वास महसूस करेगी।

बेटों के मामले में हालांकि मां की भूमिका अहम होती है। कई बार बच्चे पिता से डरते भी हैं तो मां के ही पास जाते हैं। ऐसी स्थिति में पिता की भूमिका दोस्ताना होनी चाहिए। यहां यह भी जरूरी है कि आप यदि दोस्त बनने का नाटक करेंगे तो बच्चे समझ जाते हैं और आपसे बातें छुपा ले जाएंगे। सबसे पहले उनकी दुनिया से दोस्ती करिए। अनजान बनकर भी जाएंगे तो वे खुशी-खुशी आपको सिखाएंगे और बताएंगे। अपने दोस्तों के बारे में, वीडियो गेम के बारे में, आपस में होने वाले मजाक के बारे में और बहुत कुछ। उनके लिए यह जितना सुखद होगा आपका भी उनकी दुनिया को जानना-समझना सुखद होगा।

(दिनेश श्रीनेत। कथाकार, पत्रकार, न्यू मीडिया तथा सिनेमा के विशेषज्ञ। करीब 22 सालों से पत्रकारिता से जुड़ाव। बीते 12 सालों से ऑनलाइन मीडिया में। वन इंडिया, जागरण प्रकाशन समूह तथा अमर उजाला के लिए कई वेबसाइट्स लांच कीं। सिनेमा पर वाणी प्रकाशन से पुस्तक ‘पश्चिम और सिनेमा’। कई पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। पत्नी शालिनी के साथ जेंडर तथा पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय। दो बेटे उद्भव और अनिकेत। दिल्ली एनसीआर में रिहाइश।)

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *